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Friday, 21 February 2025

वलसाड


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वलसाड़

पूरे गुजरात में पक्की सड़कें जाल की तरह फैली हुई हैं। बसों का यातायात दिन-रात चलता रहता है। हम बंबई के अंतर्राज्यीय बस अड्डे से बस में बैठे हैं और तीन घंटे हुए नहीं कि हम गुजरात में आ गये। सड़क के दोनों ओर खेत तथा फलों के बगीचे लहलहाते दिखाई देते हैं। आम, चीकू, केले, संतरे, पपीते, अमरूद और भी कई प्रकार के फल यहाँ होते हैं। गन्ने के भी बड़े-बड़े खेत हैं। सारा वलसाड़ ज़िला बहुत ही हराभरा है। वलसाड़ के समुद्र किनारे पर तिथल और उभराट जैसे सुंदर नगर हैं। गरमी के दिनों में यहाँ दूर-दूर से लोग आते हैं। कभी-कभी तो सारी छुट्टियाँ यहाँ के विश्रामगृहों में बिता देते हैं। इसी जिले में सरोवर के किनारे उकाई नाम का नगर है। वहाँ देवी अम्बा के मंदिर के प्रागण में गरम पानी के झरने हैं। पानी में गंधक होने के कारण वह गरम होता है। उसमें औषधीय गुण भी होते हैं। त्वचा की कुछ बीमारियाँ इससे दूर हो जाती हैं। एक किवदंती के अनुसार भगवान रामचंद्र जी ने अपने तीर से यहाँ पानी निकाला था। यहाँ लोगों की भीड़ लगी रहती है।

पुर्तगालियों ने दमण नाम के एक शहर पर कब्जा किया था वह इसी जिले में हैं और ईरान से भागे हुए लोग भी वलसाड़ जिले के संजाण बंदरगाह पर उतरे थे। ईरान उन दिनों पर्स कहलाता था। सातवीं सदी में अरबों ने पर्स पर हमला किया था और वे विजयी भी हो गये थे। उन्हीं का हुक्म चलने लगा। जीत हो गई तो पर्स की प्रजा को इस्लाम धर्म स्वीकारने पर मजबूर करने लगे। उस समय ईरान में पैगम्बर
जरथूष्ट्र के दिये हुए धर्म का पालन हो रहा था। लोग पवित्र अग्नि की पूजा जरशाद उन पर धर्म बदलने के लिए जोर दिया गया तो बहुत से लोग खोरासाकारले थे। जुन में छुप गये। इस तरह छुपकर रहना भी जब मुश्किल हो गया तो वे पवित्र अग्नि को साथ लेकर सात जहाजों का एक काफला बनाकर अपने अरब सागर के रास्ते से सौराष्ट्र के दीव बंदरगाह पर आये। कुछ वर्ष वहाँ बिताने के बाद उन्होंने दीव छोड़ दिया और वलसाड़ जिले के संजाण बंदरगाह पर कदम रखा। यह आठवीं शताब्दी की बात है। इस समय वहाँ जादव राणा नाम के हिंदू राजा का शासन था।

पर्स के ये पारसी लोग राजा के पास गये और कहाः "हमें अपने राज्य में आसरा दीजिए।" इतनी बड़ी संख्या में आये हुए निराश्रितों के प्रति राजा को सहानुभूति हुई। लेकिन उनके राज्य में इतने सारे विदेशियों को रखने की जगह नहीं थी। अपनी प्रजा के साथ इनको रखने का एक ही तरीका था। राजा ने एक कटोरा दूध मंगवाया। उस में चीनी मिलाई। चीनी घुल गई। दूध की एक बूंद भी बाहर नहीं गिरी।

राजा यही समझाना चाहते थे कि दूध में जैसे चीनी घुल जाती है उसी तरह पर्स से आए हुए लोगों को वहाँ की प्रजा के साथ घुल मिल जाना होगा। इस संबंध में दो शर्तें भी रखी गई। पहली शर्त यह थी कि पर्स की महिलाएँ गुजराती महिलाओं की तरह पूरा घाघरा पहनकर, उन्हीं की तरह साड़ी बाँधेंगी। और दूसरी शर्त यह थी कि उनको अपनी भाषा छोड़कर गुजराती भाषा अपनानी होगी। दोनों शर्तें सुनकर पारसी तो खुश हो गये। वे अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने देश से भाग निकले थे। जादव राणा ने हिंदू धर्म अपनाने की शर्त नहीं रखी थी। अन्य दो शर्तें पारसियों को मंजूर थी। उन्होंने संजाण के पास उदवाड़ा गाँव में अपने साथ लाये हुए पवित्र अग्नि की स्थापना की। पारसियों का धर्मस्थान "अगियारी" कहलाता है। आज भी उदवाड़ा की अगियारी पारसियों का सब से बड़ा तीर्थस्थान माना जाता है। तब से पारसी गुजरात के गुजराती बन गये हैं, स्वदेश-प्रेमी, भारतवासी बन गये हैं।

अंग्रेजों को देश से हटाने के लिए जब स्वतंत्रता आंदोलन छिड़ गया तब दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, सर दिनशा वाच्छा और भीकाजी कामा ने बहुत बड़ा योगदान दिया था। दादाभाई नौरोजी इन्डियन नेशनल कांग्रेस के स्थापकों में से एक थे। सन् 1906 के अधिवेशन में उनको अध्यक्ष चुना गया था। फिरोजशाह मेहता स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हिस्सा ले रहे थे। उन्होंने बंबई में 'बोंबे क्रोनिकल' नाम
बलसाड

का अखबार शुरू किया। दिनशा वाच्छा अठारह वर्षों तक इंडियन नेशनल कांग्रेस के सचिव रहे और सन् 1901 के अधिवेशन में अध्यक्ष भी चुने गये। भीकाजी कामा पहली पारसी महिला थीं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में प्राणपण से भाग लिया था। अंग्रेजों के खिलाफ वे इतनी उग्रता से लड़ रही थीं कि उनको भारत छोड़कर विदेश भाग जाना पड़ा। 18 अगस्त 1907 में उन्होंने लगभग 1,000 जर्मन लोगों के सामने उन्हीं की भाषा में भारत की स्वतंत्रता के लिए बड़ा जोशीला भाषण दिया। भाषण के बाद उन्होंने झंडा फहराया, जिसमें मामूली-सा परिवर्तन करके आज हमने उसे अपने राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपना लिया है। आज इसी पारसी कौम के जमशेदजी टाटा सफल उद्योगपति, होमी भाभा महान वैज्ञानिक और जुबिन मेहता विख्यात संगीतकार के रूप में सारे संसार में प्रसिद्ध हैं। पारसी कवि अरदेशर खबरदार का काव्य

"गुणवंती गुजरात। अमारी गुणवंती गुजरात। नमिये, नमिये मात। अमारी गुणवंती गुजरात।"

कवि की मृत्यु के बत्तीस साल बाद भी ये पंक्तियाँ गुजरात में गूंज रही हैं। पारसी लोग गुजरातियों के साथ इतने घुलमिल गये लेकिन उनके पर्व-त्यौहार खास उन्हीं के हैं, जैसे कि नये साल का दिन पपेती कहलाता है। इस दिन वे अगियारी में जाकर अग्नि में चंदन की लकड़ियाँ समर्पित करते हैं। धानसाक इत्यादि विशिष्ट भोजन बनाते हैं। मित्रों और रिश्तेदारों का अभिवादन करते हैं।




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